Fursat ke pal

Fursat ke pal

Wednesday, 9 May 2012

आओ मिल कर आवाज लगायें
इस प्रचार को व्यापक फैलाएं
गंगा माँ हमारी पवित्र नदिया
इसके अस्तित्व को बचाना है
आओ साथियों मिलजुल कर हमको अब
अपना फ़र्ज़ निभाना है
इस पवन नदिया में लोगों
तुम क्यों प्रदूषण फैलातो हो
सुंदर पवन नदिया को तुम क्यों
मैली करते जाते हो
करनी है जन जन में जाग्रति सब अपना उद्देश्य बनालो
इस पावं नैय्या को सब मिल जुल प्रदूषित होने से बचालो

_______________अंजना चौहान _______________
आज जी भर खेलने को जी चाहता है
आज फिर से बच्चा बनने को जी चाहता है
माँ की गोद में सो जाने को जी चाहता है
माँ के आँचल की छाँव पाने को जी चाहता है
माँ की लोरी सुनने को जी चाहता है
माँ के हाथ से खाने को जी चाहता है
फिर से तुतलाती बोली कहने को जी चाहता है
कुछ हंसी ठिठोली करने को जी चाहता है

____________अंजना चौहान _______
क्या भारत सिर्फ गरीबों का ही देश है ?
नहीं ऐसा नहीं है
कम से कम यहाँ के बड़े बड़े शहरों की
चकाचौंध को देख ऐसा नहीं कहा जा सकता
तो फिर क्यों विदेशियों को
हमारे देश में सिर्फ और सिर्फ
गरीबी और भुखमरी ही दिखाई देती है
ये प्रश्न हमेश कौंधता है मेरे जहन में
फिर क्यों विदेशी चलचित्र बनाने वालों को स्लम एरिया
गरीब , भूखे नंगे लोग , और शहर के किनारे
मलिन बस्तियों में रहने वाले लोग ही दिखते हैं
ये विदेशी लोग हमारी गरीबी का मजाक उड़ा कर आस्कर तक जीत जाते हैं
और हम बस यूँ ही देखते रह जाते हैं
क्या यही हमारी सभ्यता है ?
क्या समय समय पर यूँ ही हमारा मजाक बनता रहेगा ?
हम यूँ ही चुप बैठे रहेंगे
क्या उन लोगो के खुद के देश में गरीबी नहीं है ?
क्या कभी सरकार कुछ कदम उठाएगी ?
या यूँ ही मूक दर्शक बनी बस देखती रहेगी ....
हाँ शायद देखती रहेगी क्योकि सत्ता के गलियारों तक पहुँचते हुए
न जाने कितनी ही बातों को वादों को सरकार भूल चुकी होती है
फिर इनको गरीबों से क्या लेना देना शायद कुछ नहीं
वोट मिल जाने के बाद
ये तो पांच वर्षों तक भूल चुके होते हैं गरीब वोट बैंक को
यही प्रश्न बस कचोटता रहता है हमेशा
कब तक आखिर कब तक गरीब की गरीबी का मजाक उड़ता रहेगा ??


Sunday, 6 May 2012

विषय ...बुजुर्गों की अनदेखी
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मैं आज भी दृढ खड़ा हूँ अशोक स्तम्भ सा
इन हड्डियों में आज भी नौजवानों सी जान बाकी है
जो मुंह फेर कर चल दिए तुम मुझको छोड़
कभी पाला था इन्हीं दो हाथों से तुमको
जीवन कैसे जिया जाता है सिखलाया था अपनी बातों से
शायद मेरी शिक्षा में ही कुछ कमी है
जो संतान को आदर सम्मान न सिखा पाया
जीर्ण शीर्ण निर्बल काया समझ छोड़ गए मुझको क्यूँ
क्यूँ तुमको लाज नहीं आती
कभी तुम्हारा भी ऐसा हश्र हो सकता है
मेरी जीवनी क्या ये नहीं सिखलाती
दम आज भी बाकी है इन बूढी हड्डियों में
सक्षम हैं खुद का निर्वाह करने में
अपना खून जब धिक्कारता है तब चोट गहरे लगती है
वक्त के थपेड़ो की ऐसी भी मार सहनी पड़ती है
कुछ अपने जैसे ही अपनों के मारों संग मिल एक नया नीड़ बसाऊंगा
सबके संग बाटूंगा खुशियाँ उनकी लौटी खुशियाँ वापस लाऊंगा
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क्यों भूल जाते हैं बच्चे
ये भी उसी अवस्था से गुजरेंगे
बीते पल लौट नहीं सकते हैं वापस
जब ये खुद भुगतेंगे तब ही सुधरेंगे 
जीवन ...बस चलता जाता है
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जीवन कभी धूप छाँव तो कभी सवेरा
कभी तरह तरह के सवालों ने जमकर आ घेरा
कभी रेल की पटरी पर
पेसेंजर ट्रेन की तरह रुक रुक कर चलता
तो कभी राजधानी ट्रेन सा सरपट दौड़ता
कितने ही यात्री जैसे चढ़ते और उतरते हैं
वैसे ही कितने इस जीवन में जुड़े मिले और बिछड़े हैं
लेकिन वक्त का पहियाँ ही ऐसा
किसी के लिए नहीं रुकता बस चलता जाता है
रफ़्तार कभी धीमी कभी तेज
क्यों कोई कभी समझ ना पाता है ?
कभी सुगम तो कभी विषम
कभी ख़ुशी तो कभी गम
किन्तु रोके ये न रुक पाता है इसका काम है चलना
तो ये समय के साथ बस यूँ ही चलता जाता है
____________अंजना चौहान ____________१६/०४/२०१२
है थोड़ी बैचैनी पर किसी से कह भी ना पाऊं
अपना दुखड़ा जाकर मैं किसको सुनाऊं
भरी दुनिया में तनहा हूँ ,हर कोई खुद में ही गुम है
उलझाने इस ज़माने में किसी की ना कम हैं
जिसे भी देखो दिल उसका भारी और आँखें नम हैं
सोचती हूँ अपने गम बांटने से अच्छा औरों के ही गम बाँट लूँ
बदले में उनको थोड़ी ही सही पर मुस्कराहट दे दूँ
क्या मुमकिन यूँ ही थोडा थोडा करके सारी ही दुनिया मुस्करा दे
यूँ ही मिलजुलकर सब अपने ग़मों को भुला दें
चरों तरफ बस खुशहाली ही खुशहाली हो
बगिया को यूँ ही खिलाने वाले मेरे संग और कई माली हों
मुस्कराहटें फिर किसी की न कम हों
फिर किसी के हिस्से न कोई गम हो

______________अंजना चौहान ________________५/५/२०१२

आज सुन्दरी कह किसी ने पुकारा हमें
एक साथ कई सवालों ने आ घेरा हमें
आईने के सामने ला कर खड़ा कर दिया
गौर से आईने में खुद को न देखा था सदियों से
उसने ध्यान से देखने पर मजबूर कर दिया
देखा उम्र के निशाँ दिखने लगे हैं अब
कुछ चेहरे पर ,बालों पर भी अब तो होने लगा है असर
क्यूँ सुन्दरी कह उसने पुकारा
दिल सोचने को मजबूर करने लगा
पुछा उसी से ...वो कहने लगा
तन की सुन्दरता देखना ही बस इंसान की फितरत
मन की सुन्दरता न देखे कोए
जब तन की सुन्दरता ओढ़े सुन्दरी कहलाये
तो मन से सुंदर सुन्दरी काहे न कहलाये
यही सोच फिर हटी सामने से आईने के
आई फिर आपने उसी रूप में जो मुझपर फबता है बरसों से
बच्चों संग बच्ची बन जाना ,बड़ों संग बड़ी और हम उमर संग हसीं ठिठोली
सोचती हूँ सच ही कहा उसने ....
मन की सुन्दरता के आगे तन की सुन्दरता के कोई मायने नहीं