Fursat ke pal

Fursat ke pal

Monday, 14 May 2012

क्यों भूल गए तुम उन लम्हों को
जब हम पहरों एक दूजे संग
हंसते खिलखिलाते बिताया करते थे
कैसे हो जाती थी सुबह से शाम
भूल जाया करते थे
कभी तुम आते थे मुझको लेने
और कभी मिलने के
खूब बहाने बनाया करते थे
पीछे छूट गए वो बीते लम्हें वो अल्ल्हड़ पन
तुझ संग बीते करते हंसी ठिठोली
आज देखती हूँ पीछे मुड़ तो बस यादें ही बाकी हैं
क्यों कहा था तुमने तब मुझसे
हम जन्मो जन्मो के साथी है
अकेला जीवन कैसे बिताऊं तनहा
यही सोच कर दिल घबराता है
तू न सही पर तेरी यादों संग ही सही
अब मेरा गहरा नाता है

साथ ही तुम मुझको भी ले जाते अपने
ये एकाकी जीवन अब ........और न काटा जाता है
प्रिये अब और न काटा जाता है ....................

Sunday, 13 May 2012

कुछ सामाजिक बुराइयाँ जिनसे हम चाह कर भी पीछा नहीं छुड़ा पा रहे हैं .....
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जिंदगी एक नूर है
किसी के लिए सुरूर है
किसी का गुरूर है
तो किसी के लिए कसूर है
जिंदगी एक नूर है ..............
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माँ की कोख में अजन्मी
गर हो बालिका
इसमें उसका क्या कसूर है ....

माँ इसमें क्या गलती है मेरी
माँ मै भी हूँ अंश ही तेरा
मैं भी गोद में चाहती खेलना तेरी
मैं भी चाहती पिता का हो सर पर हाथ
पर मैंने तो रौशनी की एक किरण न पायी
न मैं तेरी कोख में खुद अपनी मर्जी से आई
क्यों बना मेरा जीवन फिर अभिशाप
मैं एक कन्या हूँ
क्या यही मेरा कसूर है
क्या यही जिंदगी का दस्तूर है .......
जिंदगी एक नूर है
किसी के लिए सुरूर है
किसी का गुरूर है
तो किसी के लिए कसूर है
जिंदगी एक नूर है ..............
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कोठे पर बैठी हर कली
किसी के आँगन की हूर है ...

मैं थी इस दुनिया से अनजान
एक अबोध बालिका जो पहुँच गयी
एक ऐसे शमशान
न जाने कितनी ही बार
एक एक रोज में सौ -सौ बार मरा करती हूँ
मैं भी चाहती थी सखियों संग बातें करना
मैं भी चाहती थी घर का प्यारा सा आँगन
फिर क्यों मुझे मिला ये नरक सा जीवन
क्या मैं एक लड़की हूँ
बस यही मेरा कसूर है
क्या मुझ जैसी तमाम लड़कियों पर
पैसे लुटाना यही पैसे वालों का दस्तूर है
जिंदगी एक नूर है
किसी के लिए सुरूर है
किसी का गुरूर है
तो किसी के लिए कसूर है
जिंदगी एक नूर है ............
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जो जवानी में हुई विधवा
इसमें मेरा क्या कसूर है ...

मैं भी चाहती हूँ
मेरे जीवन में हों सारे रंग
मिलता सिर्फ तानो भरा जीवन
मैं भी चाहती साथ किसी का
अब कैसे कटे पहाड़ सा जीवन
विधाता का विधान ही ऐसा
जो वो साथ छोड़ कर चले गए ..
जब आदमी विवाह कर सकता है फिर से
तो हम स्त्री ही क्यूँ पुनर्विवाह को तरसें
मैं एक स्त्री हूँ
क्या यही मेरा कसूर है

जिंदगी एक नूर है
किसी के लिए सुरूर है
किसी का गुरूर है
तो किसी के लिए कसूर है
जिंदगी एक नूर है ............
आस क्यूँ जगाई मिलन की प्रिय
फिर क्यूँ न आये
अगन तुमने लगे मिलन की प्रिये
फिर क्यूँ रहे बुझाए
इंतज़ार में अब तो बैचैन हुई जाती हूँ
सुध बुध भी खो बैठी हूँ
सुख चैन भी खोये जाती हूँ
आ जाओ प्रियतम मेरे
क्यों इतना तड़पाते हो
दूर दूर रहकर क्यूँ मुझसे
तुम इतना इतराते हो
जो मैं रूठी तुमसे प्रिये
तो फिर मना ना पाओगे
चाहे पुकारो मुझको कितना
पर फिर न वापस पाओगे
जो तुम छोड़ चले हो मुझको
मैं दुनिया को बिसरा दूंगी
सच्चा प्यार किया है तुमसे
मैं ये भी कर दिखला दूंगी
आ जाओ प्रियतम मेरे
क्यों इतना सताते हो ..............
आँखे मूंद बैठ कुर्सी पर
सपने देखे ये निश्छल मन

कितने ही निश्चय अनिश्चय
घुमड़ रहे कितने ख्याल
गाये जा रहे गीत बन्नी के
पड़ रही ढोलक पर थाप
बन्नी सोच रही मन में
कैसे जाऊं मैं ससुराल
क्या सच होंगे सपने मेरे
जो देखे मैंने थे सखियों संग
क्या मिलेगा मुझको
नित नूतन प्यार
नित नूतन आनंद
क्या उठाएंगे वो भी घूँघट मेरा
क्या करेंगे वो भी मेरा आलिंगन
क्या चहक उठेंगे वो भी स्पर्श पा मेरा
क्या देंगे वो फिर मीठा चुम्बन
क्या फिर अपनी बाहों में भर वो मुझको
क्या करेंगे वो मेरा स्पर्श तन
क्या संग मिल कर सपने देखेंगे
क्या पायेंगे अपुल्कित आनंद
आँखे मूंद बैठ कुर्सी पर
सपने देखे ये निश्छल मन -------
आ जाओ कान्हा अंगना में मोरे तुम प्रेम सुधा बरसाने को
रंगूँ प्रीत में मैं भी तुझ संग राधा सी इस जग को लुभाने को
वृन्दावन की गलियों में तेरा भोल बचपन बीता था
गोपियों संग राधा ने यह निश्छल प्रेम तुझसे ही सीखा था
वृन्दावन आकर तेरे चरणों में जो भी शीश नवाते हैं
भूल भाल कर सुध बुध अपनी बस तुझमें ही खो जाते हैं
श्यामल रूप निहार कर तेरा सब मंत्रमुग्ध हो जाते हैं
_________अंजना चौहान ___________

Saturday, 12 May 2012

मित्रों आज दिन में खाली थी तो पत्रिका में एक कहानी पढ़ी और उसी के आधार पर ये कविता लिखी ........

आज उसको देख , पुरानी कुछ बीती बातें
चलचित्र सी, मेरी बीती जिंदगी फिर से, सामने आयी
अनायास ही मेरे चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कान ,
लेकिन फिर मायूसी सी छायी
याद आ गए, वो बीते लम्हे फिर से
जब वो मुझे छोड़ ,वादों का अम्बार लगा
जल्दी ही वापस आने को बोला था
समझ न पायी थी मैं उस छलिया को
क्योंकि मेरा अंतर्मन भोला था
दिन हफ़्तों महीनो इंतज़ार किया
वो फिर वापस ना आया था
मैंने यह एकाकी जीवन उसके कारण ही पाया था
आज वर्षों बाद देख उसको ,ये सब बीती बातें ताजा हो आयीं
किन्तु देख उसकी नन्हीं सी बिटिया को, मैं थी हलकी सी मुस्काई
पर चोर निगाहों से देख उसने मुझको
अनदेखा किया ऐसे, जैसे कोई पहचान नहीं
पहचान गयी फिर से फितरत को उसकी ,
अब थी उससे अनजान नहीं ,
रोष हुआ खुद पर ही क्यों मैं उससे मिलने आई ??
उलटे पाँव लौटी घर को ,और अपने वर्तमान में आई
घर पहुँच कर मैंने घर की घंटी बजायी
मेरे अन्दर जो द्वन्द था मैं थी उससे बाहर आई
दरवाजा खोल सामने पतिदेव खड़े थे
मैं अपने भावों को न रोक पायी
लिपटी उनसे, जैसे पहला मिलन हो संग अश्रु धरा बह आई
वो कुछ आश्चर्यचकित थे किन्तु खुश थे
आज उन्होंने मुझको पहली बार पाया था
मैंने भी दिल से पतिदेव को आज, पहली बार अपनाया था

______________अंजना चौहान ______________




Thursday, 10 May 2012

आ तरुअर की छाँव में दोनों बैठ बतियाएं
कैसे बीता लड़कपन संग में आ बीते पलों को गुन जाएँ
तेरी एक झलक पाने को मैं पहरों इंतज़ार किया करता था
जो तुम न आती थीं मिलने प्रिये तो मैं बैचैन हुआ करता था
तेरी मजबूरी को समझ दिल को अपने समझा लेता था
तेरी एक झलक पाकर ही मैं बस तुझको पूरा पा लेता था
संग बिताये तुझ संग उन पलों की बातें आज भी ,
ऐसी लगतीं मनो कल ही की बात हो
तेरे मेरे प्यार का बंधन ऐसा जैसे जन्मों का साथ हो
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हाँ प्रिय मैं भी बमुश्किल ही तन्हाई पाती थी
घर वालों की नज़रों से छुप तुमसे मिलने आती थी
अहसास प्यार का मुझमें भी था पर कहने से शर्माती थी
दुनिया की तीखी नज़रों से मैं थोडा डर जाती थी
किन्तु अब नादाँ नहीं हूँ कह सकती हूँ ,
मैं तुमको ही चाहती हूँ ,
परिवार की परम्पराओं संग चल ,फेरे ले पवित्र अग्नि के
आओ तुम संग विवाह बंधन में बांध जाती हूँ
गर तुमको मंजूर हो प्रस्ताव मेरा तो दर पर मेरे
सहनाई संग बारात लेकर आ जाना
घर वालों से हाथ मांगकर मेरा डोली अपने घर ले जाना
_______________अंजना चौहान __________________