Fursat ke pal

Fursat ke pal

Saturday, 27 October 2012

एक पतली सी पगडण्डी 
ऊँचे नीचे रास्तों पर 
कहीं सीधी तो कहीं बलखाती
कहीं आड़ी तिरछी रेखाओं सी खिची 
जहां सड़क नहीं वहां आज भी 
यही पहुंचाती गंतव्य तक
एक पतली सी पगडण्डी
पहाड़ी स्थान और जगह सुनसान
कठिन जीवन जंगल बियावान
कहीं नहीं विकास का नाम
भागती दौड़ती जिंदगी से यहाँ आज भी अनजान
आज भी दूर से पानी भर कर लाना
पैदल ही मीलों रास्ता तय कर जाना
इसी पगडण्डी से अपनों से जुड़ जाना
ये पगडण्डी आड़ी तिरछी रेखाओं सी खिंची
रास्ते के नाम पर एक मात्र पहचान
यहाँ न गाड़ियों का शोर ना ही प्रदूषण
ना ही यहाँ किसी को होती टेंशन
लोग सोते आराम से लम्बी चादर तान
बस यही एक पगडण्डी अपनों से जोड़ने का
एक मात्र साधन ...जिस पर लोग ढोते साजो सामान

Sunday, 5 August 2012

आज मेरे अरमान भी उड़ रहे हैं उडती हुई पतंग की तरह लेकिन 
जानती हूँ तुम मेरे अहसासों की डोर थामें खड़े हो मुंडेर पर छत की
डर जाती हूँ कहीं कोई आकर काट ना जाए मेरे अरमानो की पतंग 
आ गिरें मेरे अरमान भी कटी पतंग की तरह ही जमीं पर 
चरखी पकड़ाकर मुझे अपने संग ही खड़ा कर लेते हो तुम 
मेरे चेहरे पर उतरते चढ़ते भावों को अच्छी तरह पढ़ लेते हो तुम  
तुम हो की मेरे डर को बखूबी भांप लेते हो 
जानती हूँ तुम खिलाडी हो मंझे हुए पतंगबाज बड़े हो 
पतंग को ऊँचे उड़ाना अच्छी तरह जानते हो तुम 
मेरे अरमानो की डोर तुम कटने नहीं दोगे यह जानती हूँ 
बसे हुए मेरे इस चमन को तुम उजड़ने नहीं दोगे मैं मानती हूँ 

Saturday, 4 August 2012

अजनबी कौन हो तुम मेरी रूह को छू लेते हो 
बिखर जाती हूँ मैं ख्यालों में भी तेरा अहसास पाकर 

मेरे अहसासों की डोर थामें खड़े हो तुम उजाले के इंतज़ार में 
सिमट जाती हूँ मैं ख्वाबों में भी तेरे नज़दीक आकर 

सहर का सूरज आज एक नया सन्देश गुनगुनाता है 
फ़ना हो जाती हूँ मैं आज तेरी बाहों में समाकर 

Wednesday, 4 July 2012


छोड़ कर जो चल दिए मुझे यूँ बीच राह में अकेले
क्या बिन मेरे तुम खुद अकेले जी पाओगे ??
बीते हुए कुछ नाजुक से पलों को साथ के अपने
क्या तुम अपनी यादों से भुला भी पाओगे ??
छाप दिया अक्स तुमने अपना मेरे इस जीवन पर
क्या उस अक्स को तुम धुंधला भी कर पाओगे ??
जब अंत यही था अपनी प्रेम कहानी का
तो मेरी जिंदगी में तुम आये ही क्यूँ थे ??
हसीं सपने दिखा मुझको तुम लुभाए ही क्यूँ थे ??
मैंने सुना था प्यार में दिल टूट भी जाया करते हैं
मेरा दिल यूँ टूटेगा सोचा ना था
मेरा सपना ही मुझसे छूटेगा सोचा ना था
सुना था दूरियां भी नजदीकियों का कारण बनती हैं कभी कभी
क्या हमारी ये दूरियां उसे मेरी याद दिलाएंगी ??
बीते पलों की प्यार से सिंचित बहारें क्या फिर से लौट कर आएँगी ??

अपनी इन्ही दूरियों को नजदीकियों में बदलने की चाह में
तुम्हारी पुजारन .........मैं
 —

Monday, 25 June 2012

चांदनी रात में नहाई हुई एक परी सी आती तुम मेरे ख्वाबों में 
आज चांदनी रात है , मेरे ख्वाबों में नहीं तुम हकीकत में आना 
कभी आकर चुपके से हौले से एक मीठा राग छेड़ जाती हो तुम 
आज बैठ साथ में मेरे , प्यार में डूबी पूरी ग़ज़ल ही सुनाना 
जब भी आती हो तुम पास मेरे छोड़ मुझको उदास कर जाती हो तुम 
इस बार आई तो फिर कभी छोड़ कर ना जाना ......ओ मेरी जाना 
सोते जागते बस तुम ही तुम हो ,चाहता हूँ उम्र भर मैं तेरा साथ निभाना 

______________अंजना चौहान ______________


Monday, 28 May 2012


टूटी हुई आस बचाने को आजा
दिल में बसी याद मिटाने को आजा
अपनी मुहब्बत में बनाया था जो कभी हसीं ताजमहल
आ आज वही ईमारत गिराने को आजा

कभी मुझे जायदाद सी लगती थी मुहब्बत अपनी
प्यार की ईमारत में दरार आ जाएगी सोचा ना था
कभी हमने अपने आने वाले पलों को
झाड़ फानूस के गलीचों सा सजाया था
उन पर धूल जम जाएगी ,सोचा ना था
क्या मुमकिन नहीं उन्हें फिर से सजाना ?
क्या मुमकिन नहीं उन सपनो को फिर से बुन पाना ?
अगर नहीं, तो फिर तुम मेरी जिंदगी में आये ही क्यूँ ?
आये भी थे तो रूह में इस कदर समाये ही क्यूँ ?
क्या मुमकिन है रूह का शरीर से जुदा हो जाना ?
क्या मुमकिन है मेरा बिन तुम्हारे जी पाना ?

लेकिन जी रही हूँ सिर्फ एक आस लेकर
अपनी यादों के टूटे फूटे खंडहरों के साथ ...
तुम्हारे इंतज़ार में.... तुम्हारे प्यार में ..........

_____________अंजना चौहान ____________