Fursat ke pal

Fursat ke pal

Saturday, 27 October 2012


आपकी हंसी
.....
कभी गुदगुदाती है
कभी दिल बहलाती है
कभी हंसाती है मुझे तो
कभी जोर से हँसाते हँसाते रुला जाती है ......आपकी खिलखिलाती हँसी

जब तुम हंसती हो ...
...
जब तुम हंसती हो तो मैं भी हंस देता हूँ
जब तुम हंसती हो तो मेरा रोम रोम खिल उठता है
जब तुम हंसती हो तो मेरी फिजा महकने लगती हैं
हंसती रहा करो तुम्हारा खिलखिलाकर हँसना अच्छा लगता है
पिया की बाट जोहती प्रियतमा ....
......
आस क्यूँ जगाई मिलन की प्रिय 
फिर क्यूँ न आये 
अगन तुमने लगे मिलन की प्रिये 
फिर क्यूँ रहे बुझाए
इंतज़ार में अब तो बैचैन हुई जाती हूँ
सुध बुध भी खो बैठी हूँ
सुख चैन भी खोये जाती हूँ
आ जाओ प्रियतम मेरे
क्यों इतना तड़पाते हो
दूर दूर रहकर क्यूँ मुझसे
तुम इतना इतराते हो
जो मैं रूठी तुमसे प्रिये
तो फिर मना ना पाओगे
चाहे पुकारो मुझको कितना
पर फिर न वापस पाओगे
जो तुम छोड़ चले हो मुझको
मैं दुनिया को बिसरा दूंगी
सच्चा प्यार किया है तुमसे
मैं ये भी कर दिखला दूंगी
आ जाओ प्रियतम मेरे
क्यों इतना सताते हो
इस धरा का श्रृंगार कर 
इसे सहेज संवार कर 
सहेज इस प्रकृति को 
तू इसे ही प्यार कर 

निज स्वार्थ की खातिर
जब यह सौन्दर्य ख़त्म किया
क्यों तूने जरा भी सोचा नहीं
हाय ये तूने क्या किया

कितने पंछियों का घर उजड़ा तूने
कितने वृक्षों को काट कर
कितने ही घर बना डाले
नदियों को भी पाट कर

याद रख प्रकृति जब
विनाश लीला खेलती है
नष्ट हो जाता है सब
पल भर के ही खेल में

कितने ही घर बह जाते हैं पल में
जब नदी आती है उफान पर
कितने ही घर ढह जाते हैं
हिलती है जब धरती जलजले के रूप में

तो याद रख बस याद रख
प्रकृति के साथ खेलना नहीं
सहेज इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए
अब इसे और छेड़ना नहीं
दहेज़ ही कुरीति फैलाती है अत्याचार 
प्रथा यह कर रही आज भी समाज को बीमार 
जिसे ब्याह कर लाये हो उससे बोल तो मीठे बोलो 
उसे हर रोज तुम दहेज़ के तराजू में ना तोलो 
जिसके साथ तुम जीवन भर करते हो साथ निभाने का वादा 
उसी को दहेज़ के लोलुप व्यवसायी कर देते हैं कूट कूट कर आधा
क्या तुमको उस अबला अबोध नारी पर जरा भी दया नहीं आती
जो अपने माता पिता, भाई बहन को छोड़ तुम्हारे घर आकर है बस जाती
इतना भी नहीं सोचते कि क़ानून के हत्थे चढ़ गए तो कहीं के नहीं रह जाओगे
प्रभु के बानाए बन्दों प्रभु से तो डरो उसकी लाठी में बहुत आवाज होती है उसे क्या मुंह दिखाओगे
एक पतली सी पगडण्डी 
ऊँचे नीचे रास्तों पर 
कहीं सीधी तो कहीं बलखाती
कहीं आड़ी तिरछी रेखाओं सी खिची 
जहां सड़क नहीं वहां आज भी 
यही पहुंचाती गंतव्य तक
एक पतली सी पगडण्डी
पहाड़ी स्थान और जगह सुनसान
कठिन जीवन जंगल बियावान
कहीं नहीं विकास का नाम
भागती दौड़ती जिंदगी से यहाँ आज भी अनजान
आज भी दूर से पानी भर कर लाना
पैदल ही मीलों रास्ता तय कर जाना
इसी पगडण्डी से अपनों से जुड़ जाना
ये पगडण्डी आड़ी तिरछी रेखाओं सी खिंची
रास्ते के नाम पर एक मात्र पहचान
यहाँ न गाड़ियों का शोर ना ही प्रदूषण
ना ही यहाँ किसी को होती टेंशन
लोग सोते आराम से लम्बी चादर तान
बस यही एक पगडण्डी अपनों से जोड़ने का
एक मात्र साधन ...जिस पर लोग ढोते साजो सामान

Sunday, 5 August 2012

आज मेरे अरमान भी उड़ रहे हैं उडती हुई पतंग की तरह लेकिन 
जानती हूँ तुम मेरे अहसासों की डोर थामें खड़े हो मुंडेर पर छत की
डर जाती हूँ कहीं कोई आकर काट ना जाए मेरे अरमानो की पतंग 
आ गिरें मेरे अरमान भी कटी पतंग की तरह ही जमीं पर 
चरखी पकड़ाकर मुझे अपने संग ही खड़ा कर लेते हो तुम 
मेरे चेहरे पर उतरते चढ़ते भावों को अच्छी तरह पढ़ लेते हो तुम  
तुम हो की मेरे डर को बखूबी भांप लेते हो 
जानती हूँ तुम खिलाडी हो मंझे हुए पतंगबाज बड़े हो 
पतंग को ऊँचे उड़ाना अच्छी तरह जानते हो तुम 
मेरे अरमानो की डोर तुम कटने नहीं दोगे यह जानती हूँ 
बसे हुए मेरे इस चमन को तुम उजड़ने नहीं दोगे मैं मानती हूँ