Fursat ke pal

Fursat ke pal

Saturday, 27 October 2012


बिखरना मैंने सीखा नहीं
पिघलना मैंने सीखा नहीं

टकरा जाऊँगी किसी से भी अपने अधिकार कि खातिर
डरना मैंने सीखा नहीं
हाँ मैं एक स्त्री हूँ
अकारण किसी से झगड़ना मैंने सीखा नहीं
संस्कारों और मर्यादाओं का बंधन मुझे प्यारा है
पराये को पाने कि चाह में गिरना मैंने सीखा नहीं
हाँ मैं एक स्त्री हूँ
संभल कर चलना मैं जानती हूँ
आत्मविश्वास से भरी आत्मनिर्भर हूँ मैं
डरना मैंने सीखा नहीं
डोर हूँ रिश्तों की
रिश्तों को डोर में पिरो कर रखना जानती हूँ
परिवार का महत्त्व क्या होता है मैं बखूबी पहचानती हूँ
हाँ मैं एक स्त्री हूँ
सशक्त ,समस्याओं से जूझती और उबरती हुई
परिवार के लिए मर मिटना मैं जानती हूँ
हौसले से भरी
नाकामियों को शिकस्त देना मेरा काम है
पस्त होना मैंने सिखा नहीं
चोट खाने कि आदत है सिहरना मैंने सीखा नहीं
हाँ मैं एक स्त्री हूँ
अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना मैं जानती हूँ
वक़्त के थपेड़ों को सहने कि अब आदत हुई
भीड़ से अलग
खुद में सिमटना मैंने सीखा नहीं
हाँ मैं एक स्त्री हूँ
हाँ मैं एक स्त्री हूँ
स्त्री को समाज में पहचान दिलाना जानती हूँ
आज सुन्दरी कह किसी ने पुकारा हमें 
एक साथ कई सवालों ने आ घेरा हमें 

आईने के सामने ला कर खड़ा कर दिया 
हमें आज उसने खुद ही से रूबरू कर दिया 
गौर से आईने में खुद को न देखा था सदियों से
उसने ध्यान से देखने पर मजबूर कर दिया
देखा उम्र के निशाँ दिखने लगे हैं अब
कुछ चेहरे पर ,बालों पर भी असर होने लगा है अब
क्यूँ सुन्दरी कह उसने पुकारा
क्या वो देता है कोई गुप चुप इशारा
दिल सोचने को मजबूर करने लगा
पुछा उसी से ...वो कहने लगा
तन की सुन्दरता देखना ही बस इंसान की फितरत
मन की सुन्दरता न देखे कोए
जब तन की सुन्दरता ओढ़े सुन्दरी कहलाये
तो मन से सुंदर सुन्दरी काहे न होए
यही सोच फिर हटी सामने से आईने के
छलिया है ये , इस आईने का काम ही है छलना
आई फिर आपने उसी रूप में जो मुझपर फबता है बरसों से
बच्चों संग बच्ची बन जाना ,बड़ों संग बड़ी और हम उमर संग हसीं ठिठोली

सोचती हूँ सच ही कहा उसने ....
मन की सुन्दरता के आगे तन की सुन्दरता के कोई मायने नहीं 
मेरी बर्तन वाली मेरे बर्तन बहुत चमकाती है 
उलट पलट कर थाली को वह उसमें मुंह देख इठलाती है 
मेरी बर्तन वाली मेरे बर्तन बहुत चमकाती है 

धो धो कर बर्तनों को वह टोकरे में रखती जाती है 
थाली को कर किनारे पर खड़ा कटोरी पर कटोरी चढ़ाती है
गिलास में रखती है धो धो कर चम्मच
कुकर पर कढ़ाही पलट कर रख जाती है
मेरी बर्तन वाली मेरे बर्तन बहुत चमकाती है

खटर पटर के बीच बर्तनों की वह सुरीला राग सुनाती है
बर्तनों के बेसुरे तराने को उसकी मधुर आवाज दबाती है
जो भरा हो सिंक बर्तनों से तो वह गुस्से में चिल्लाती है
चाय पीती है गिलास में वह और नाश्ता करके जाती है
मेरी बर्तन वाली मेरे बर्तन बहुत चमकाती है

आपकी हंसी
.....
कभी गुदगुदाती है
कभी दिल बहलाती है
कभी हंसाती है मुझे तो
कभी जोर से हँसाते हँसाते रुला जाती है ......आपकी खिलखिलाती हँसी

जब तुम हंसती हो ...
...
जब तुम हंसती हो तो मैं भी हंस देता हूँ
जब तुम हंसती हो तो मेरा रोम रोम खिल उठता है
जब तुम हंसती हो तो मेरी फिजा महकने लगती हैं
हंसती रहा करो तुम्हारा खिलखिलाकर हँसना अच्छा लगता है
पिया की बाट जोहती प्रियतमा ....
......
आस क्यूँ जगाई मिलन की प्रिय 
फिर क्यूँ न आये 
अगन तुमने लगे मिलन की प्रिये 
फिर क्यूँ रहे बुझाए
इंतज़ार में अब तो बैचैन हुई जाती हूँ
सुध बुध भी खो बैठी हूँ
सुख चैन भी खोये जाती हूँ
आ जाओ प्रियतम मेरे
क्यों इतना तड़पाते हो
दूर दूर रहकर क्यूँ मुझसे
तुम इतना इतराते हो
जो मैं रूठी तुमसे प्रिये
तो फिर मना ना पाओगे
चाहे पुकारो मुझको कितना
पर फिर न वापस पाओगे
जो तुम छोड़ चले हो मुझको
मैं दुनिया को बिसरा दूंगी
सच्चा प्यार किया है तुमसे
मैं ये भी कर दिखला दूंगी
आ जाओ प्रियतम मेरे
क्यों इतना सताते हो
इस धरा का श्रृंगार कर 
इसे सहेज संवार कर 
सहेज इस प्रकृति को 
तू इसे ही प्यार कर 

निज स्वार्थ की खातिर
जब यह सौन्दर्य ख़त्म किया
क्यों तूने जरा भी सोचा नहीं
हाय ये तूने क्या किया

कितने पंछियों का घर उजड़ा तूने
कितने वृक्षों को काट कर
कितने ही घर बना डाले
नदियों को भी पाट कर

याद रख प्रकृति जब
विनाश लीला खेलती है
नष्ट हो जाता है सब
पल भर के ही खेल में

कितने ही घर बह जाते हैं पल में
जब नदी आती है उफान पर
कितने ही घर ढह जाते हैं
हिलती है जब धरती जलजले के रूप में

तो याद रख बस याद रख
प्रकृति के साथ खेलना नहीं
सहेज इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए
अब इसे और छेड़ना नहीं
दहेज़ ही कुरीति फैलाती है अत्याचार 
प्रथा यह कर रही आज भी समाज को बीमार 
जिसे ब्याह कर लाये हो उससे बोल तो मीठे बोलो 
उसे हर रोज तुम दहेज़ के तराजू में ना तोलो 
जिसके साथ तुम जीवन भर करते हो साथ निभाने का वादा 
उसी को दहेज़ के लोलुप व्यवसायी कर देते हैं कूट कूट कर आधा
क्या तुमको उस अबला अबोध नारी पर जरा भी दया नहीं आती
जो अपने माता पिता, भाई बहन को छोड़ तुम्हारे घर आकर है बस जाती
इतना भी नहीं सोचते कि क़ानून के हत्थे चढ़ गए तो कहीं के नहीं रह जाओगे
प्रभु के बानाए बन्दों प्रभु से तो डरो उसकी लाठी में बहुत आवाज होती है उसे क्या मुंह दिखाओगे