Fursat ke pal

Fursat ke pal

Saturday, 27 October 2012


कवि भावनाओं की उडान है
कभी आकाश में ऊँचे उडाता है तो
कभी गहरे समन्दर में गोते लगाता है
कवि क्रांति का आगाज है
कभी जोश भर देता है वीरता का तो
कभी पल में मायूस भी कर देता है
कवि एक साज है कवि तरन्नुम है कवि तराना है
कभी मीठा तराना छेड़ जाता है तो
कभी दर्द भरा नगमा सुनाता है
कवि हँसाने का एक बुलबुला है
कभी हँसता है तो
कभी हंसाते हंसाते रुलाता है
कवि कल्पना है कवि अहसास है कवि आस है
कभी सत्य है तो
कभी छलावा है
कवि अजर अमर है क्योंकि
कवि भावना है...और भावनाएं कभी नहीं मरती हैं

मैं परिंदा हूँ
वो जो सुबह सूरज की किरणे फूटते ही
चहचहाने लगता है
जो आकाश में ऊँचे , बहुत ऊँचे उड़ता जाता है
मैं एक परिंदा हूँ
एक चंचल मन सा जो कभी कहीं नहीं टिकता
हाँ लेकिन साँझ ढले अपने घर को जरूर लौटता है
मैं परिंदा हूँ
जो दूर देश से मीलों का सफ़र तय कर आता है
अपनी मनपसंद जगह चुन वहां कुछ समय के लिए
मैं एक परिंदा हूँ
जो अपनी सुन्दरता से सबको मोह लेता है
निश्छल सा जो अपने में ही मग्न रहता है
आकाश में ऊँचे उड़ना जिसका काम है और
वो बस अपनी धुन में मग्न अपना काम बखूबी करता है
उसका काम है उड़ना तो वो आकाश में स्वछंद उड़ता है
बिना किसी रोक टोक उसे उड़ना पसंद है
वैसे ही मुझे भी एक पंछी सी ही जिंदगी भाती है
स्वछंद और बहती बयार सी बिन रोक टोक की
हाँ मैं कह सकती हूँ की मैं नील गगन में उड़ने वाला पक्षी हूँ
भावनाएं मुझे अभी यहाँ तो अभी वहां दूर तक पल में उड़ा ले जाती हैं


प्रकृति का सौन्दर्य अनूठा
प्रकृति की छठा निराली है
पहाड़ों की इन वादियों की कथा सुनाने वाली है
पानी के सोतों की निर्मल धारा
यूँ ही चलते फिरते मिल जाती है
पर्वतों की गोद से निकलती निर्मल धारा
स्वछंद निर्झर बहती जाती हैं
भव्य श्री बद्री श्री केदार यहाँ के
देश के तीर्थ स्थल कहलाते हैं
गंगोत्री यमनोत्री इन्ही के संग
चार धामों में गिने जाते हैं
यही से बहती माँ गंगे
उत्तरांचल को पूरे
जगत में पहचान दिलाती है
हरिद्वार ऋषिकेश पवित्र नगरी के
नाम से पहचान पाती हैं
इन्हीं वादियों में बीता था बचपन
यहीं हंसी ठिठोली करते थे
यहीं पर हम खेला कूदा करते थे
और इन्ही खेतों में चढ़ते और उतरते थे
कठिन था जीवन किन्तु सरस था
माँ की वो ममतामय छाव श्रद्रस था
अब भी जब याद आता है
मेरा गाव.........
मुझे बुलाता है __
मिली है मुझको एक प्यारी सहेली 

सखी संग मिल मैं लौट चली बीते दिनों में 
वो कालेज की मस्ती फिर से याद आने लगी 
वो बातें कुछ बीती लुभाने लगीं 
करती हैं गुप चुप कुछ बातें साथ घंटों बिताना
मिजाज है कुछ कुछ एक जैसा तो
खेल खेल में दिल की बातें कह जाना
मैं अल्लहड़ नादान वो अलमस्त अलबेली
मेरी प्यारी सखी वो मेरी प्यारी सहेली

मैंने किया तुमको बहुत ही मिस
एक लगती है काजू तो दूजी किसमिस
एक के साथ मिस किया पिक्चर जाना
तो एक के साथ मिस किया उन्धिया खाना
एक के तो शोक ही निराले है
हर तरह के किरदार हमने अपनी दोस्ती में पाले है
एक के साथ खूब कहकहे लगाये हैं
तो दूजी के साथ शायरी के मज़े उड़ाए हैं
सबको अपने साथ खूब ही घुमाया है
किट्टी में जा कर चाट पकोड़ी भी खूब जम कर खाया है
आज हम सबसे दूर है तो क्या फेस बुक पर तो रोज मिल जाते हैं
अपने सब दोस्त हमने याद बहुत आते हैं
कभी अकेले में भी जम कर हसाते हैं तो
कभी तन्हाई में बहुत रुलाते हैं
हमने अपने दोस्त बहुत किस्मित से पाए हैं
और जम कर दोस्तों संग मजे उडाए हैं
हम चाहते हैं सबको प्यारे प्यारे दोस्त मिल जाएँ
और सब दोस्ती के जम कर मज़े उड़ायें

काश !! समय पर गणित पढ़ा होता


काश हमने भी समय पर गणित पढ़ा होता तो इंजीनियर बन जाते
करते बड़े बड़े काम और खूब ही नोट कमाते
पर क्या करे इस बुद्धि का समय पर ना चल पायी
न सीखा अंक गणित इसने और ना ही बीज गणित सीखने की जुगत भिडाई
जोड़ घटा और गुणा भाग इनमें तो दिमाग रम जाता
पर बीज गणित की इकवेजन में तो सारा दिमाग ही गुल हो जाता
रेखाएं खींच बड़े आराम से त्रिभुज तो बना लेते
पर जब बारी आती कोण का मान बताने की तो हम दायें बाएँ हो लेते
फार्मूलो का खेल हमें कभी समझ ना आया
एक को किया याद अभी तो दूजे को उसमें मिलाया
पहाड़े रटते रटते हमारा दम ही निकल जाता
जब आती सुनाने की बारी हमारी तो चेहरा लाल हो आता
लघुत्तम और महत्तम का हिसाब समझ न आया
पाई का मान कैसे निकले इसने बड़ा भरमाया
त्रिज्या ,परिधि ,छेत्रफल ,घनत्व, आयत ये तो नाम ही कठिन से लगते
तो सोचो कैसे हम इनके फार्मूले भी रटते
प्रमेय और निर्मय का तो खेल कभी ना भाया
काम और घंटों के सवालों ने हमें बड़ा रुलाया
भिन्न और अनुपात के सवालों ने हमें बड़ा छकाया
वर्गमूल के कठिन सवालों ने जम कर पसीना छुडवाया
गिर पड़ कर किसी तरह पास होकर हम दसवीं तक आये
चुनने को मिला हमें विषय तो हम लिए गणित से पीछा छुडाये
तो भैय्या हमारी यही कमजोरी के चक्कर में हम इंजीनियर ना बन पाए
कैसे कमायें नोट अब हम कैसे जुगत भिड़ाये
मुझे मुर्दों से डर नहीं लगता मैं शमशान का रखवाला हूँ 
मुझे आग से डर नहीं लगता मैं रोज मुर्दों को आग के हवाले करने वाला हूँ 
हड्डियों के बुतों को देख मैं कैसे डर सकता हूँ जब ,
मैं रोज हड्डिया चुनवाने वाला हूँ
इंसान इस संसार में रोते हुए जन्म लेता है ,
लेकिन जब जाता है सबको रुला जाता है
ये दुनियाँ कभी जज्बाती तो कभी मतलबी होती है बहुत
जज़्बात क्या होते हैं यह मैं जान कर भी जानना नहीं चाहता
क्योंकि कितने ही लोगों को मैंने यहाँ जलते देखा
जलते वक़्त उनके रिश्तेदारों को बिलखते देखा, किन्तु
शरीर जलकर राख भी न हो पाए, मैंने उनको आपस में झगड़ते भी यहीं देखा है
अगर जज्बात ऐसे होते हैं..........तो नहीं चाहिए
अगर रिश्तेदार ऐसे होते हैं .......तो नहीं चाहिए
मैं खुश हूँ अपनी जगह अपने काम से
कम से कम कुछ तो अच्छा काम करता हूँ
शरीर की इस मोह माया को ख़त्म करवाता हूँ

मैं शमशान का पहरेदार हूँ ......... मैं मुर्दों को जलवाता हूँ