Fursat ke pal

Fursat ke pal

Thursday, 20 February 2014

जम गयी स्याही 
अकड़ गयी कलम 
हाथ हुए बेजान 
सर्दी बहुत है 
खिड़की से देखती हूँ 
दूर तक कोहरा है 
कुछ भी दिखाई नहीं देता 
इस धुएं के सिवा 
सोचा था कुछ लिखूंगी 
उड़ते हुए पक्षियों पर 
किन्तु आज की ठण्ड ने
पक्षियों को घोसले में ही
अल्कसाने को
मजबूर कर दिया
लिखूं तो लिखूं कैसे
मैं भी बैठी हूँ अलसाई सी
रजाई में दुबकी हुई
गुनगुनी धूप के इंतज़ार में
रोज मिलने आते हो 
तुम मेरी खिड़की में 
मुझसे मिलने 
कभी दीखते हो दूर 
तो कभी बिलकुल पास 
कभी मासूम तो कभी शोख चंचल 
कभी मायूस उदास 
तुम हो सबसे अलग ...ख़ास 
निहारती रह जाती हूँ मैं 
तुम्हे अपलक 
अच्छा लगता है
तुम्हारा यूँ मिलने आना
रोज मेरी खिड़की पर .
जब तक मैं जियूंगी 
तुम जीवित रहोगे 
मेरी यादों में 
मेरी बातों में 
मेरे भावो में 
अहसास बनकर 
मैं चाहती हूँ 
तुम सदा 
रहो मेरे साथ 
एक मीठी याद बनकर 
शोख चंचल सी
सौगात बनकर
जीने का खूबसूरत
अंदाज बनकर 
जिस तरह पत्थर पर टपक टपक कर 
एक बूँद अपने निशाँ दर्ज कर देती है 
ठीक उस तरह ही हर हवा का झोंका 
मुझे खींच लेता है , गुजरे ज़माने में 
सच कितने हसीं हुआ करते थे वो दिन 
जब होती थी मेरी दुनिया तुमसे रौशन 
सन्नाटों को चीर कर आज भी सुनाई दे जाती है मुझे 
तुम्हारी खिलखिलाती हंसी 
और अनायास ही हंस पड़ता हूँ मैं भी तुम संग 
तुम्हारी चंचलता भरी मीठी आवाज 
बरबस ही घुल गयी कानो में मिश्री सी
एक अक्स बस गया नैनों में सदा के लिए
गुजर जाते हैं तनहा पल तुम्हारे साथ
तुम्हें याद करते करते
तुम्हारे साथ हँसते मुस्कराते
कभी तुमसे बात करते करते ..

Sunday, 15 September 2013

मुझे पसंद है ब्रांडेड सामान 
किन्तु हमेशा ही पहुँच से दूर 
पसंद है तो है 
क्यों ना विंडो शोपिंग के जरिये मज़ा लिया जाए भरपूर 
तो चल दिए हम 
पैरों में पहन अपने 
एक मात्र एडिडास के जूते
विंडो शापिंग को 
सच असीम आनंद है 
आधी हसरत 
चीज देख हो जाती पूरी
और कुछ छूने के बाद भी रह जाती अधूरी
गुच्ची के पर्स
हमेशा ही मेरी पहुँच से दूर
क्यूँ ना लूँ छूकर इसका मज़ा भरपूर
महीने भर की तनख्वाह
कैसे एक बटुए पर उड़ा दूँ
ना बाबा ना
किन्तु देखने में है कौन हर्ज़
खुद की एक इच्छा शांत करना भी तो है मेरा ही फ़र्ज़
बड़े आत्म विश्वास के साथ
दाखिल हुए और और उठा लिया वही पर्स
जो खिड़की में से देखते ही लुभा गया मुझे
प्राइस टेग सबसे पहले नज़र आया जो डरा गया मुझे
१४५९९९ मात्र वाह क्या कहने
अपनी जेब जबाब दे जायेगी
यह इच्छा तो सेल के सीजन में भी अधूरी रह जायेगी
कोई बात नहीं जी मन है समझा लिया
कंधे पर डाला शीशे में नज़र डाल देखा
और लो जी हो गयी हसरत पूरी
अब आ गयी सत्यपाल साड़ियों की बारी
साड़ी जिनके आगे हर नारी हारी
बुत पर लगी हर साड़ी लुभाती है
खरीदने को मजबूर कर जाती है मुझे ...........पर
हो गयी मुझपर भारतीय नारी फिर एक बार हावी
ना मत ललचा अंजना तेरे पास नहीं है किसी धन कुबेर के ताले की चाभी
एक दो बार पहनी फिर किस काम की ...सोचा ...और बढ़ गए आगे
बीबा की कुर्तियाँ हाँ बहुत पसंद हैं मुझे
और जेब पर ज्यादा भारी भी नहीं पड़तीं
तो लो जी कुछ तो खरीद ही लिया
ज्वेलरी शाप .....कितनी ही ले लो कम है
खूबसूरती में चार चाँद लगाने को जितनी भी लो कम है
अब आ गया शो रूम वुडलेंड का
और जूते चप्पल मेरी कमजोरी
यहाँ आते ही तो जाती है मेरी हसरत पूरी
कोई समझौता नहीं इस पसंद से
कुछ लिया कुछ पसंद किया और छोड़ दिया
४०% सेल में भी तो कुछ लेना है
सेल का भी खेल क्या खूब निराला है
इसने भी जम कर हमारी जेब पर डाका डाला है
कुछ हसरत की पूरी कर और कुछ छोड़ दीं अधूरी
और चल दिए हम
हाथ में कुछ पेकेट थामे ........सेल के मौसम के इंतज़ार में

Tuesday, 6 August 2013

वो बोलता बहुत है 
पर दिल की जुबाँ से कुछ कहता नहीं 
सबसे बात कर लेगा पर 
मेरे आगे जुबान खोलता नहीं 
चाह कर भी मौन अपना 
तोड़ नहीं पाता ..ना जाने क्यूँ 
कुछ कहते कहते चुप हो जाना 
कुछ लिखते लिखते रुक जाना 
कभी सामने बैठ घंटों चुप बिता जाना 
कभी कुछ कहने के लिए उकसाना 
उसकी हर बात समझ आती है मुझे
पर वह खुद अपनाप कुछ नहीं कहता
वह बोलता बहुत है पर
उसका मौन कभी नहीं टूटता
कभी राजनीति पर चर्चा तो
कभी किसी नेता पर शब्दों का बेमतलब खर्चा
कभी सामाजिक बातें तो कभी कैसे गुजरीं तनहा रातें
सब कह जाता है पर उसका मौन नहीं टूटता
उसका अखबार लगभग रोज छपता है
चींख चींख कर अपना दर्द बयाँ करता है
उलटे लटक चमगादड़ों से अपने हालात बयाँ करता है
क्या उसकी चींख पहुँच जाती है वहां तक
जहाँ वह पहुंचाना चाहता है
शायद हाँ ...ओह सचमुच हाँ
यह उसका मौन ही तो है जो
की जब तुम बोलोगे तो क्या होगा ........अंजना
माँ की पाती पुत्र को 
..
बेटा कैसे हो 
तुम्हारी याद बहुत आती है 
तुम्हारा तुतलाना आज भी 

कानो में गूंज जाता है 
ठुमक ठुमक तुम्हारा चलकर आना 
नज़रों के सामने घूम जाता है 
बहुत दिन हुए न कोई पत्र न कोई फोन 
क्या तुम्हें हमारी जरा भी याद नहीं आती 
क्या पापा की तड़प तुम तक नहीं पहुँच पाती 
जानती हूँ उन्हें जताना ना आया 
पर क्या एक पुत्र पिता को 
इतना भी ना समझ पाया 
बहुत व्यस्त रहते हो ना काम में 
शायद वक्त नहीं बूढ़े माँ बाप के लिए 
समझने को उनके जज्बात के लिए 
लेकिन क्या करु माँ हूँ ना 
बिन दिल की बात कहे कैसे रहूँ 
सो कह गयी भावनाओं में बह गयी 
खुश रहो फलो फूलो हमारी दुआएं तुम्हारे साथ हैं 
बस चन्द घडी तुमसे मिलने की आस है 
ना आ सको तो एक कोई बात नहीं 
अपनी आवाज की एक सीडी भिजवा देना 
अपनी आवाज हमको तुम इसी तरह सुनवा देना 
जब जब तेरी माँ उदास होगी 
तब तब तू न सही तेरी आवाज तो हमारे पास होगी 
तेरी हंसती किलकारियां फिर से कानो में जब पड़ जायेंगी 
इन बूढ़े माँ बाप के जीवन में नए प्राण घोल जायेंगी 
शुभाशीष बेटा तुम्हारे दो बोल सुनने को तरसती तुम्हारी माँ .