Fursat ke pal

Fursat ke pal

Monday, 28 May 2012


टूटी हुई आस बचाने को आजा
दिल में बसी याद मिटाने को आजा
अपनी मुहब्बत में बनाया था जो कभी हसीं ताजमहल
आ आज वही ईमारत गिराने को आजा

कभी मुझे जायदाद सी लगती थी मुहब्बत अपनी
प्यार की ईमारत में दरार आ जाएगी सोचा ना था
कभी हमने अपने आने वाले पलों को
झाड़ फानूस के गलीचों सा सजाया था
उन पर धूल जम जाएगी ,सोचा ना था
क्या मुमकिन नहीं उन्हें फिर से सजाना ?
क्या मुमकिन नहीं उन सपनो को फिर से बुन पाना ?
अगर नहीं, तो फिर तुम मेरी जिंदगी में आये ही क्यूँ ?
आये भी थे तो रूह में इस कदर समाये ही क्यूँ ?
क्या मुमकिन है रूह का शरीर से जुदा हो जाना ?
क्या मुमकिन है मेरा बिन तुम्हारे जी पाना ?

लेकिन जी रही हूँ सिर्फ एक आस लेकर
अपनी यादों के टूटे फूटे खंडहरों के साथ ...
तुम्हारे इंतज़ार में.... तुम्हारे प्यार में ..........

_____________अंजना चौहान ____________



Tuesday, 22 May 2012

मेरा एक पहला प्रयास .....
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तुम्हें चेहरा पढ़ लेने की आदत है 
मुझे चेहरा छुपाने की आदत नहीं |

मेरे उन छुपे लफ़्ज़ों का क्या होगा 
जो दिल में जज़्ब है पर इबादत नहीं |

जब तुम दिल के करीब ला सकते हो 
क्यूँ दिल में समाने की इजाजत नहीं |

जो गर तेरा प्यार ही तेरी पूजा है 
तो मेरा प्यार भी कोई शरारत नहीं |

तुझे नखरे दिखाने की आदत बहुत 
मेरे नखरों में भी कम अदावत नहीं |

तेरे प्यार पाने को मर मिटे सनम 
यह सिर्फ प्यार है कोई शहादत नहीं |

जब तुम दिल की जबाँ पढ़ लेते हो 
हमें लफ्जों में कहने की आदत नहीं 

Monday, 21 May 2012

उसका स्पर्श पाते ही
प्रणय की धारा फूटी
बसंत ऋतु से बासन्ती
रंग में रंगी
वो प्रेयसी मेरी
स्पर्श पा उसका
अंग -अंग बोले
धड़कने बढ़ने लगीं
कामना के आगोश में
हो भाव विव्हल
कर चेतना के द्वार बंद
हम आलिंगन भर कर
प्रेयसी में डूब
कर रहे चिंतन
कैसे खो गए सयंम
करके उनका आलिंगन
ये वियोगी भी
डूब रहा
मधुमास में
समां रही वो
अंतर्मन में
इस छोर से उस छोर
उसका स्पर्श पाते ही

जब भी कलम उठाती हूँ 
कुछ भी लिख न पाती हूँ 
कुछ बिखरा हुए शब्दों को 
अपने ही इर्द गिर्द पाती हूँ 
समेटना चाहती हूँ खयालो को 
फैले हैं ये चारों तरफ
कुछ समेटती हूँ तो कुछ में 
गहरे उलझ जाती हूँ 
जब भी कलम उठती हूँ 
खुद को लिखने में 
असमर्थ ही पाती हूँ 
सोचती  हूँ लिखूं 
सखियों के बारे में तो 
लड़कपन में पहुँच 
जाती हूँ 
वो हंसी ठिठोली 
वो अल्लाहडपन पेड़
कक्षा से बंक मार 
केन्टीन से समोसे खाना
यही सब बातें याद करते हुए
बस विचारों में खो जाती हूँ
क्या लिखूं क्या छोड़ू
कुछ समझ न पाती हूँ
बस लिखने में फिर से
खुद को असमर्थ ही पाती हूँ
जब भी लिखने बैठूं
विचारों में गहरे  
उलझ जाती हूँ  
लिखने बैठती हूँ कुछ 
और लिख कुछ जाती हूँ 


तुम आये मेरे जीवन में नव चेतना का संचार हुआ 
हाँ मैं तुमसे कह सकती हूँ मुझको तुमसे प्यार हुआ 
ये मन हिलोरे लेता है भावनाओं में मैं बह सी चली 
खिल रही है डाली डाली मन उपवन की कली कली
मन भौरा सा भ्रमित हुआ जाता है तेरा प्यार पाकर 
ना जी पाउंगी जिंदगी अकेले मैं प्रिये तुझे अब खोकर 

_____________अंजना चौहान ____________

Sunday, 20 May 2012

बस तुम ही तुम

जिधर भी देखूं
बस तुम ही तुम
नज़र आते हो
मेरी हर फिजा में
तुम चुपके से
आकर बस जाते हो
मेरी साँसों में तुम
गहरे समाये हो
रूह का रिश्ता ही
कुछ ऐसा बना
तुम अब दो जिस्म
एक जान बन आए हो
हर जनम में मैं
बस तेरा साथ
यूँ ही चाहती हूँ
जैसे अपनाया इस
जन्म में, हर जन्म में
बस तुझको ही
पाना चाहती हूँ .

Friday, 18 May 2012


जिंदगी है कैसी मकड़ जाल सी 
कभी उलझी तो कभी सुलझी 
कभी है दुश्मन तो कभी सहेली 
कभी खुली किताब तो है कभी पहेली 
कभी प्रश्नसूचक सी सवाल उठाती
कभी खुद ही खुद सारे उत्तर बताती
अनुभव बहुत फिर भी रोज ही उलझ जाती
विचारों का ताना बना मैं बस रोज यूँ ही बुनती जाती 
जिंदगी "थान" सी  मैं रोज तह कर लगाती 
जितना समेटूं फिर भी फैला ही पाती 
जिंदगी कभी खिला गुलाब
कभी "सिर्फ" काँटों का साथ 
कभी नागवार तो कभी खुशगवार 
अभी है मासूम तो कभी यौवन से भरपूर 
हाँ ये जिंदगी है बस ये मकड़ जाल सी 
.......एक अबूझ पहेली ....