Fursat ke pal

Fursat ke pal

Saturday, 27 October 2012


रची है मेहँदी हाथों में
सौंधी सौंधी खुशबू आई
धूम हुई है घर में मेरे
मन में सबके हरियाली छाई
पिया मोरे आने को हैं
एक बंधन में बंध जाने को हैं
नया उजियारा होने को है
जीवन में नयी उमंगें छा जाने को हैं
सपने पूरे हो जाने को हैं
नया घरोंदा बस जाने को है ................अंजना चौहान
सुन्दरता की मूरत सी वो दिखती है चाँद से बढ़कर 
बड़ी फुर्सत से तराशा है उसे कोई नहीं मेरे महबूब से बढ़कर
जी चाहे उड़ जाऊं अम्बर में ऊँचे ....
मुमकिन है क्या बिन पंख उड़ पाना ....
भावनाओं की उड़ान है मेरी ,
चाहे जितना भी ऊपर उड़ जाऊं ...
है कठिन सोच को हकीकत बनाना... 
पर सोच है की मानती ही नहीं ,
है मुश्किल इस सोच को रोक पाना ....
ना उम्मीद होकर भी ,
उम्मीदों का दिया जलाया हमने ....
क्या मुमकिन है फिर ...
इस जलती लौ को बुझाना ....
हम रोज ही तेल देते हैं ,
दिए को अपनी उम्मीदों का ...
लौ करती उजियारा आने वाले पलों में
प्रयास हो सार्थक और भरोसा हो खुद पर
तो नामुमकिन नहीं खुद को ऊपर उठाना

छोड़ कर जो चल दिए मुझे यूँ बीच राह में अकेले
क्या बिन मेरे तुम खुद अकेले जी पाओगे ??
बीते हुए कुछ नाजुक से पलों को साथ के अपने
क्या तुम अपनी यादों से भुला भी पाओगे ??
छाप दिया अक्स तुमने अपना मेरे इस जीवन पर
क्या उस अक्स को तुम धुंधला भी कर पाओगे ??
जब अंत यही था अपनी प्रेम कहानी का
तो मेरी जिंदगी में तुम आये ही क्यूँ थे ??
हसीं सपने दिखा मुझको तुम लुभाए ही क्यूँ थे ??
मैंने सुना था प्यार में दिल टूट भी जाया करते हैं
मेरा दिल यूँ टूटेगा सोचा ना था
मेरा सपना ही मुझसे छूटेगा सोचा ना था
सुना था दूरियां भी नजदीकियों का कारण बनती हैं कभी कभी
क्या हमारी ये दूरियां उसे मेरी याद दिलाएंगी ??
बीते पलों की प्यार से सिंचित बहारें क्या फिर से लौट कर आएँगी ??

अपनी इन्ही दूरियों को नजदीकियों में बदलने की चाह में
तुम्हारी पुजारन .........मैं
जन्म लिया और माँ के ममतामयी आँचल में पनपती है जिंदगी 
बचपन में हंसी ठिठोली करते पंख लगा कर उड़ जाती है जिंदगी 

गया बचपन जवानी आई ये बड़ी ही भाई है जिंदगी 

किसी के प्यार में हसीं सपने सजाती है जिंदगी 

कभी है तो हँसाती कभी रुलाती है कभी अपना बनती है ये जिंदगी
कभी खिला के प्यार में धोखा सiरे सपने भी तोड़ जाती है ये जिंदगी

एक प्यारी सी जीवनसंगीनि पायी गृहस्थी जोडती है जिंदगी
जीवन में कुछ उतार और कुछ चढ़ाव बस यूँ ही बीत जाती है जिंदगी

गयी जवानी आया बुढ़ापा किसी की अच्छी पर किसी की ठहरी है ये जिंदगी
अपने कुछ अधूरे सपनो को अपने ही बच्चों में सजाती है जिंदगी
बच्चो संग कभी कभी खुद भी बच्ची बन जाती है जिंदगी
किसी खुशनुमा किसी की लाचार तो किसी की अभीशाप ये है जिंदगी
इस जहां से उस जहां को प्यारी हो जाती है जिंदगी
क्या तुम भी ना ..........
हर वक्त बैठ खिड़की में चाँद को देखा करते हो 
बस सिर्फ मेरा दीदार करो ....मैं तो हर पल तुम्हारे करीब हूँ 
चाँद का क्या ये तो खेल खेलता है आँख मिचोली का
हर सुबह के आते ही ये चला जाता है 
आज वो मेरा ही क़त्ल कर पूछता मुझ ही से है ..कैसी हो ??
अब इल्जाम भी क्या दूँ उसे ...जो मेरी हर बात से अनजान है
शायद मैं ही मजबूर थी अपनी सोच से उबर न सकी 
अपनी सोच की अलग दुनियाँ मैंने खुद ही तो बसाई थी 
मेरी दुनियाँ में चारों तरफ .....बस तुम ही तो थे ...
पर ....तुम्हारा वजूद ...ना था ...
सोचा था कभी तो समझोगे मुहब्बत को मेरी ...तुम ..लेकिन
तुम ...कुछ भी ना समझोगे ...ऐसा सोचा ना था
आज घायल हूँ मैं ....शायद कारण भी खुद ही हूँ अपनी बर्बादी का
अब इल्जाम भी क्या दूँ ...जब तुम मेरी हर बात से अनजान हो
...और ....हर देखा हुआ ख्वाब सच हो जाए ....ये मुमकिन भी नहीं है