Fursat ke pal

Fursat ke pal

Sunday, 3 March 2013

जो बोया 
जब उसे काटने का वक़्त आया 
तो वो हमको ही ना भाया 
यही नियति है 
समय चक्र बड़ा बलवान 
कथनी और करनी से पहले 
रखो शब्दों का ध्यान
आदर करो बड़ों का तो पाओगे आशीष 
प्यार करोगे छोटों को तो पाओगे सम्मान ....
दो हंसों का जोड़ा जब मधुर मिलन में खो जाता है 
बेजुबानों का निश्छल प्रेम हमें मुहब्बत का पाठ पढाता है 
न्योछावर करने को तन मन यह हमें ललचाता है 
एक दूजे के लिए समर्पण यह हमें सिखलाता है 
देख कर सुन्दर चित्र सलोना मन चंचल हो जाता है 
साथ पीया का चाहूँ मैं भी अब इंतज़ार मुझे सताता है
जल्दी आ जाओ प्रियतम अब और रुका नहीं जाता है 
विरह के बादल छंट आये यह मधुमास तुम्हें बुलाता है..
पुरानी अलमारी ठसाठस भरी 
सफाई अभियान को कमर कसी 
जैसे जैसे अलमारी से सामान निकाला 
अतीत के पन्नो ने जम कर उलझा डाला 
पलटने शुरू किये जो यादो के सिलसिले 
कुछ बिखरे मोती आज फिर से आ मिले 
झखझोर डाला कुछ बीती बातों ने
मन तरंग कर डाला कुछ सुनहरी यादों ने
कभी मुस्काती तो कभी आँसू बहाती
मैं अतीत में गहरे उलझती जाती
कभी शर्माती कभी सकुचाती
कभी गुस्से से आँखें लाल हो आतीं
डायरी में संजोया हुआ हर पन्ना ऐसे
बीते कल से आज को सजालूँ जैसे
डायरी में इनके वो ख़त
ओह इन्हें भी लिखना आता है
शब्दों का साथ इन्हें भी भाता है
भावों को पन्ने पर सजाना
नखरे दिखाना रूठी को मनाना
वादें वो कसमें या थीं दिखावटी रस्में
जिनसे होकर गुजरी थी मैं कभी
आज फिर से एक बार गुजर रही हूँ अभी
फिर से इस डायरी ने बीती बातों को जीवंत कर डाला
चालीस की उम्र में बीस का सा जोश भर डाला
सोचा कुछ नया धमाल मचाया जाए
जिंदगी को सुनहरे पलों से सजाया जाए
उबासियाँ ना लेने लगे तो यह सफ़र तो
हर पल को सतरंगी रंगों से सजाया जाए
फिर देखना लम्हा लम्हा हसीं होगा
गुजरते वक़्त के साथ गुजर भी गए तो कोई गम ना होगा

और फिर मैं डायरी के अंतिम पन्ने को पलटती
यादों के झरोखे से बाहर आई खुद से एक वादा करती
अपने आज को सजाने का जोश लिए
पुरानी अलमारी जिसमें कैद हैं कई सुनहरे पलों के दस्तावेज
उसे बंद करते हुए जस का तस
इस आस में कि ये पल ये सुहानी यादें
यूँ ही हिस्सा बनी रहें मेरे आने वाले जीवन का
और मैं उम्र डर उम्र
उन्हीं पलों को या उससे भी ज्यादा हसीं पलों को जीती रहूँ हमेशा...अंजना

Sunday, 13 January 2013

पहले कभी ना हुआ था ऐसा जैसा अबकी बार हुआ 
नैनों संग नैना टकराए और दिल किसी ने पहली बार छुआ 
तुम गुलाब के फूल सी संग अपने काँटों को लायीं थी 
कहीं चुभे कांटें हाथों में पर कहीं फूलों का नर्म अहसास जगाईं थीं 
तुम्हारे अधरों पर थी खिली मोहक मु
स्कान और चेहरे पर थी हया की लाली
तुम संग अपने पहले मिलन वो घडी थी बहुत निराली
हम अपलक निहार रहे थे तुमको और तुम बैठीं नैन झुकाए थीं
बीच बीच में जब टकराते थे नैना तो तुम थोडा सकुचाई थीं
भूल गए थे हम समय की सीमा समय दौड़ता जाता था
पहर बदल चूका था पर फिर भी हमें होश ना आता था
मौन रहकर भी अंखियों से हमने अपना प्रणय निवेदन था कर डाला
इंतज़ार था उस पल का जब उनकी हाँ संग अपना मधुर मिलन था होने वाला
अपने नयनों की भाषा से प्रेयसी ने भी अपना मौन समर्थन था दे डाला
पहली ही मुलाक़ात में हमने एक दूजे को था अपना मन मीत बना डाला

Friday, 21 December 2012

परेशानियों का सबब यह जिंदगानी है 
ना बिजली है ना पानी है 
रोजमर्रा की वस्तुओं के ऊँचे होते जा रहे दाम 
बढती हुई महंगाई की निशानी हैं 
मिलावट का कारोबार गरम है 
जो खा रहे हैं उसके नकली होने का भरम है 
दूध में घुल रहा जहर तो दूध बंद कर सकते हैं पीना 
लेकिन घुल रहा है जो जहर हवाओं में तो क्या बंद कर दें सांस भी लेना 
दवाएं नकली हो रहीं दुआओं से काम चलाओ 
अपनापन अब रहा नहीं आपसदारी में,तो लाउडस्पीकर बजवाओ
गंगा मैली हो गई यमुना से बची ना कोई आस
मुश्किल हुआ अब सोचना कैसे बुझ पाएगी प्यास
अभावों में जी रहे इंसान के बढ़ रहे अभाव
खून की गर्मी इतनी बढ़ गयी खाता अब वो भी ताव
जवानी मशगूल है प्यार के किस्से दोहराने में
योजनायें बंद तरक्की की पड़ी हैं दफ्तर खाने में
पुरानी समस्याएं खड़ी हैं मुंह बाए नए बिल हो रहे पास
संसद से अब जनता भला कैसे लगाए आस
आन्दोलन के चलने से जनजीवन ठप्प हो जाता है
सैलाब जब उमड़ घुमड़ सड़कों पर उतर आता है
तो भैय्या कोई तो जुगत भिड़ाओ
इन समस्याओं से पार पाने को
सवा सौ करोड़ से ज्यादा की जनता की अगुआई को
कोई तो आगे आओ ........................................अंजना चौहान

Thursday, 13 December 2012

ऐसा क्यूँ होता है ....
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भीगी पलकें आँखें हैं नम 

दिल में छुपा है कोई गहरा गम 
तेरी मेरी बात के किस्से हैं कम 
दुनिया के फरेब में फंस गए हम
मुस्कान लबों पर ये दिल रोता है
आखिर ऐसा क्यूँ होता है .......

सामने वो जब भी आता है
आबोहवा खिला जाता है
मौन है वो मौन है हम
सिमट ना पाए एक दूजे में है गम
दूर से देख के भी मन खुश होता है
आखिर ऐसा क्यूँ होता है ....

देख उदासी मनमीत की अपने
बैचेनी मेरी बढती ही जाती
उलझन उसकी सुलझाऊं कैसे
सोच सोच मैं समझ ना पाती
दर्द उसे हो ये दिल रोता है
आखिर ऐसा क्यूँ होता है ........

हो साथ तेरा मेरा
ख्वाबों में हो तेरा बसेरा
सोते खोते हुआ सवेरा
नींद खुली जो टूटा सपना
तनहा ये दिल क्यूँ रोता है
आखिर ऐसा क्यूँ होता है .......

चाह हो जिसकी पूरी हो जाए
उम्मीद ना हो जो वो मिल जाए
बंधन प्रीत का जो बंध जाता है
मन चंचल फिर हो जाता है
बावरा मन ये मयूर सा नाचे
मिली ख़ुशी खिल आई बांछे
ये बैरी मनवा सुध बुध खोता है
आखिर ऐसा क्यूँ होता है

Sunday, 9 December 2012


तुम एकाकी मैं एकाकी 
क्यों ना बन जाएँ एक दूजे के साथी
कुछ तुम अपने मन की कहना 
कुछ मैं अपने मन की कह जाउंगी
हल्का हो जाएगा भारी मन
फिर तुम अपने घर और मैं अपने घर जाउंगी.....हँसते हँसते